कारक – विभक्तेः परिचयः
कारकविभक्ति – यत्र क्रियायां साक्षात् अन्वयो दृश्यते तदुच्यते कारकविभक्तिः
करोति क्रियां निर्वतयति जनयति व्युत्पादयति इति कारकम्
केचिद् वदन्ति – क्रियाजनकत्वं कारकत्वम् – रामः गच्छति
तथा च क्रियान्वयित्वं कारकत्वम् – रामः इत्यस्य गच्छति क्रियायामन्वयः दृश्यते साक्षात् ।
उपपद – विभक्तेः परिचयः
पदमाश्रित्य जायमाना विभक्तिः उपपदविभक्तिः
यथा – सह योगे तृतीया पुत्रेण सह आगतः पिता
व्याकरणशास्त्र अधिगम हेतु प्रयुक्त तकनीकी शब्दावली
सारांश –
संस्कृत शास्त्रों में भी तकनीकी शब्दावली प्रयोग देखने को मिलता है जिसमें व्याकरणशास्त्र में अधिगम हेतु विशेष अथवा तकनीकी शब्दावली प्रयोग किया गया है पाणिनि जी पारिभाषिक तथा परिनिष्ठित तथा अन्वर्थ शब्दावली का प्रयोग किया है । अधिगम विशेष औचित्यता को प्रदर्शन करता है। तथा शास्त्रबोध में सहायक होते है।
जैसे तङानावात्मने पदम् सूत्र आत्मनेपद सञ्ज्ञा को बता रहा है। जो एव विशेष प्रयुक्त शब्द है। आत्मनेपद । निपात एकाजनाङ् सूत्र द्वारा भी निपात को द्योतित किया जाता है। व्याकरण में सञ्ज्ञा प्रकरण का आरम्भ भी शास्त्र प्रवृत्ति के लिये होता है । जिससे विशेष पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग स्पष्ट है।
आत्मनेपद, परस्मैपद तथा कर्मप्रवचनीय तथा लकार और निपात, प्रकृति, प्रत्यय धातु इत्यादि शब्दावली प्रयोग व्याकरण में देखने को मिलता है । विभिन्न विशेष तकनीकी शब्दावली प्रयोग किये गये इसी को परिलक्षित करके यह शोधलेख प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
अधिगम हेतु तकनीकी शब्दावली का प्रयोग विविध अर्थ प्रयोजन तथा सर्वबोध हेतु किया जाता है। जैसे कि मनुष्यों को ले जाने के लिये वाहन का प्रयोग लोकयान के नाम से व्यवहार होता है यद्यपि लोक शब्द मनुष्य वाचक है फिर भी यान के साथ संयुक्त करके विविध यानों में भी लोकयान का प्रयोग हो रहा है ऐसे पारिभाषिक परिनिष्ठित शब्दों का प्रयोग तकनीकी शब्दावली संस्कृत शास्त्रों द्वारा किया जाता है।
वैसे संस्कृत जगत् के लिये व्याकरणशास्त्र कि विशेष प्रासङ्गिकता है। पाणिनि व्याकरण में विविध तकनीकी शब्दावली प्रयोग अधिगम हेतु देखा जा सकता है।
भगवान पाणिनि जी ने कुछ विशेष तकनीकी शब्दावली का प्रयोग किये है तो अर्थ की दृष्टि से प्रयुक्त है जैसे अन्वर्थ सञ्ज्ञा का प्रयोग कर्मप्रवचनीय , आत्मनेपद , परस्मैपद , एकवचन , द्विवचन , बहुवचन, अनुनासिक इत्यादि सञ्ज्ञायें अर्थ के अनुसार की जाती है इन्ही शब्दों को व्याकरण के तकनीकी शब्दों के रूप में व्यवहार किया जाता है। सञ्ज्ञा प्रकरण में प्रयत्न सवर्ण आदि शब्द व्यवहार से शास्त्र के प्रवृत्ति की वस्तुस्थिति का बोध होता है। क्योकि ऐसे शव्दावली के बिना व्याकरण का अधिगम नही हो सकता है।
कर्म क्रियां प्रोक्तवन्तः इति कर्मप्रवचनीयाः जो कर्म क्रिया को कहा गया है उसे कर्मप्रवचनीय कहा जाता है। तथा जो अपने लिये पद प्रयुक्त होता है उसे आत्मनेपद कहा जाता है । जो दूसरे के लिये पद प्रयुक्त किया जाता है उसे परस्मैमपद कहा जाता है । वैसे ही एकमुच्यते अनेन इति एकवचन कहा जाता है। दो के लिये जो कहा जाये उसे द्विवचन कहा जाता है। बहुत संख्या का होने पर हम बहुवचन का प्रयोग करते है। ऐसे ही नासिकामुगतः अनुनासिकः व्यवहार किया जाता है। ऐसे विविध अर्थों को बताने के लिये तकनीकी शब्दावली का व्याकरणशास्त्र में पाणिनि जी ने प्रयोग किये है।
संस्कृत व्याकरण में ऐसे ही बहुत शब्दों का प्रयोग अधिगम के लिये देखा जा सकता है। बिना हम प्रयुक्त विशेष पारिभाषिक शब्दों के शास्त्र को नही समझ सकते ।
लकार शब्द का प्रयोग पाणिनि जी काल के लिये प्रयुक्त करते हैं। शब्दविज्ञान को समझने के लिये काल के अनुसार शब्दप्रयोग देखा जा सकता है। लकार वाचक काल प्रयोग किया गया वर्तमान काल लकार लट् द्वारा वैसे ही लिट् लुट् लृट् लेट् लोट् लङ् लिङ् लुङ् लृङ् विभिन्न लकारों द्वारा सूक्ष्मकाल विभाजन देखा जा सकता है।
धातु सञ्ज्ञा भूवादयो धातवः पाणिनि सूत्र के द्वारा क्रिया वाचक शब्दों का धातु सञ्ज्ञा विधान किया गया है। अर्थदृष्टि से देखेंगें तो धातु शब्द धा धातु औणादिक तुन् प्रयोग किया गया है। तो धातु शब्द निष्पन्न होता है जिसका अर्थ धारयति इति धातु धारण करता है , उसे धातु कहा जाता है प्रश्न होने पर उत्तर आता है। अर्थों को धारण करता है। इसीलिये पाणिनि जी ने क्रिया वाचक के लिये धातु शब्द प्रयोग किया जिससे धातुओं को सभी अर्थों में बोला जाता है। धातुनामनेकार्थः वाक्य भी फलित होता है। क्योंकि धारणाद् धातु कहने से अर्थ स्वीकृति स्पष्ट होती है। ऐसे ही निपात शब्दप्रयोग सञ्ज्ञा में आया है अर्थ होता है। रखा गया अथवा गिराया गया , प्रश्न हुआ क्या रखा गया तो उत्तर में आता है अर्थों को जो रखा गया उसे निपात कहते जो भिन्न – भिन्न अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। जैसे च, वा, ह इत्यादि ऐसे निपात आदि बहुत शब्दों का प्रयोग पाणिनि जी ने किया है अतः विभिन्न तकनीकी शब्दावली का प्रयोग व्याकरणशास्त्र में दर्शन होता है।
सन्दर्भ ग्रन्थ
- पाणिनि अष्टाध्यायी
- वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी
शोधकर्ता
डा. मनीष शर्मा